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आदि पर्व
अध्याय २१४
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वैशम्पाय़न उवाच
आमन्त्र्य धर्मराजानमनुज्ञाप्य च भारत |  १७   क
जग्मतुः पार्थगोविन्दौ सुहृज्जनवृतौ ततः ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति