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शान्ति पर्व
अध्याय २१४
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युधिष्ठिर उवाच
द्विजातय़ो व्रतोपेता यदिदं भुञ्जते हविः |  १   क
अन्नं व्राह्मणकामाय़ कथमेतत्पितामह ||  १   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति