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शान्ति पर्व
अध्याय २१४
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भीष्म उवाच
भार्यां गच्छन्व्रह्मचारी ऋतौ भवति व्राह्मणः |  १०   क
ऋतवादी सदा च स्याज्ज्ञाननित्यश्च यो नरः ||  १०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति