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वन पर्व
अध्याय २१४
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मार्कण्डेय़ उवाच
सुपर्णी सा तदा भूत्वा निर्जगाम महावनात् |  १०   क
अपश्यत्पर्वतं श्वेतं शरस्तम्वैः सुसंवृतम् ||  १०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति