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वन पर्व
अध्याय २१४
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मार्कण्डेय़ उवाच
दृष्टीविषैः सप्तशीर्षैर्गुप्तं भोगिभिरद्भुतैः |  ११   क
रक्षोभिश्च पिशाचैश्च रौद्रैर्भूतगणैस्तथा |  ११   ख
राक्षसीभिश्च सम्पूर्णमनेकैश्च मृगद्विजैः ||  ११   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति