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शान्ति पर्व
अध्याय ३०
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वासुदेव उवाच
तौ तु शप्त्वा भृशं क्रुद्धौ परस्परममर्षणौ |  २७   क
प्रतिजग्मतुरन्योन्यं क्रुद्धाविव गजोत्तमौ ||  २७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति