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वन पर्व
अध्याय २१४
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मार्कण्डेय़ उवाच
तत्स्कन्नं तेजसा तत्र सम्भृतं जनय़त्सुतम् |  १६   क
ऋषिभिः पूजितं स्कन्नमनय़त्स्कन्दतां ततः ||  १६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति