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वन पर्व
अध्याय २१४
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मार्कण्डेय़ उवाच
तस्य तं निनदं श्रुत्वा महामेघौघनिस्वनम् |  २२   क
उत्पेततुर्महानागौ चित्रश्चैरावतश्च ह ||  २२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति