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वन पर्व
अध्याय २१४
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मार्कण्डेय़ उवाच
द्वाभ्यां भुजाभ्यामाकाशं वहुशो निजघान सः |  २६   क
क्रीडन्भाति महासेनस्त्रीँल्लोकान्वदनैः पिवन् |  २६   ख
पर्वताग्रेऽप्रमेय़ात्मा रश्मिमानुदय़े यथा ||  २६   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति