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वन पर्व
अध्याय २१४
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मार्कण्डेय़ उवाच
स तस्य पर्वतस्याग्रे निषण्णोऽद्भुतविक्रमः |  २७   क
व्यलोकय़दमेय़ात्मा मुखैर्नानाविधैर्दिशः |  २७   ख
स पश्यन्विविधान्भावांश्चकार निनदं पुनः ||  २७   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति