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वन पर्व
अध्याय २१४
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मार्कण्डेय़ उवाच
तस्य तं निनदं श्रुत्वा न्यपतन्वहुधा जनाः |  २८   क
भीताश्चोद्विग्नमनसस्तमेव शरणं यय़ुः ||  २८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति