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वन पर्व
अध्याय २१४
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मार्कण्डेय़ उवाच
स तूत्थाय़ महावाहुरुपसान्त्व्य च ताञ्जनान् |  ३०   क
धनुर्विकृष्य व्यसृजद्वाणाञ्श्वेते महागिरौ ||  ३०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति