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वन पर्व
अध्याय २१४
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मार्कण्डेय़ उवाच
स विशीर्णोऽपतच्छैलो भृशमार्तस्वरान्रुवन् |  ३२   क
तस्मिन्निपतिते त्वन्ये नेदुः शैला भृशं भय़ात् ||  ३२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति