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वन पर्व
अध्याय २१४
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मार्कण्डेय़ उवाच
स तं नादं भृशार्तानां श्रुत्वापि वलिनां वरः |  ३३   क
न प्राव्यथदमेय़ात्मा शक्तिमुद्यम्य चानदत् ||  ३३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति