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वन पर्व
अध्याय २१४
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मार्कण्डेय़ उवाच
ततः प्रव्यथिता भूमिर्व्यशीर्यत समन्ततः |  ३६   क
आर्ता स्कन्दं समासाद्य पुनर्वलवती वभौ ||  ३६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति