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शल्य पर्व
अध्याय २३
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सञ्जय़ उवाच
तस्मिञ्शव्दे मृदौ जाते पाण्डवैर्निहते वले |  १   क
अश्वैः सप्तशतैः शिष्टैरुपावर्तत सौवलः ||  १   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति