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वन पर्व
अध्याय २१४
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मार्कण्डेय़ उवाच
तस्मादेतद्रक्ष्यमाणा गरुडी सम्भवाम्यहम् |  ९   क
वनान्निर्गमनं चैव सुखं मम भविष्यति ||  ९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति