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आदि पर्व
अध्याय २१५
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वैशम्पाय़न उवाच
धनुर्मे नास्ति भगवन्वाहुवीर्येण संमितम् |  १४   क
कुर्वतः समरे यत्नं वेगं यद्विषहेत मे ||  १४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति