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द्रोण पर्व
अध्याय १२१
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सञ्जय़ उवाच
ततो दृष्ट्वा विनिहतं सिन्धुराजं जय़द्रथम् |  ४१   क
पुत्राणां तव नेत्रेभ्यो दुःखाद्वह्वपतज्जलम् ||  ४१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति