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शान्ति पर्व
अध्याय २१५
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भीष्म उवाच
यस्तु कर्तारमात्मानं मन्यते साध्वसाधुनोः |  १७   क
तस्य दोषवती प्रज्ञा स्वमूर्त्यज्ञेति मे मतिः ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति