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अनुशासन पर्व
अध्याय १४
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उपमन्युरु उवाच
यदि देय़ो वरो मह्यं यदि तुष्टश्च मे प्रभुः |  १८७   क
भक्तिर्भवतु मे नित्यं शाश्वती त्वय़ि शङ्कर ||  १८७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति