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शान्ति पर्व
अध्याय २१५
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भीष्म उवाच
कृतप्रज्ञस्य दान्तस्य वितृष्णस्य निराशिषः |  ३०   क
नाय़ासो विद्यते शक्र पश्यतो लोकविद्यया ||  ३०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति