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शान्ति पर्व
अध्याय २१५
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शक्र उवाच
येनैषा लभ्यते प्रज्ञा येन शान्तिरवाप्यते |  ३३   क
प्रव्रूहि तमुपाय़ं मे सम्यक्प्रह्राद पृच्छते ||  ३३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति