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शान्ति पर्व
अध्याय २१५
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प्रह्राद उवाच
आर्जवेनाप्रमादेन प्रसादेनात्मवत्तय़ा |  ३४   क
वृद्धशुश्रूषय़ा शक्र पुरुषो लभते महत् ||  ३४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति