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शान्ति पर्व
अध्याय २१५
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भीष्म उवाच
अक्रुध्यन्तमहृष्यन्तमप्रिय़ेषु प्रिय़ेषु च |  ६   क
काञ्चने वाथ लोष्टे वा उभय़ोः समदर्शनम् ||  ६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति