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वन पर्व
अध्याय २१५
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मार्कण्डेय़ उवाच
अन्वजानाच्च स्वाहाय़ा रूपान्यत्वं महामुनिः |  १२   क
अव्रवीच्च मुनीन्सर्वान्नापराध्यन्ति वै स्त्रिय़ः |  १२   ख
श्रुत्वा तु तत्त्वतस्तस्मात्ते पत्नीः सर्वतोऽत्यजन् ||  १२   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति