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वन पर्व
अध्याय २१५
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मार्कण्डेय़ उवाच
निवसन्ति वने ये तु तस्मिंश्चैत्ररथे जनाः |  २   क
तेऽव्रुवन्नेष नोऽनर्थः पावकेनाहृतो महान् |  २   ख
सङ्गम्य षड्भिः पत्नीभिः सप्तर्षीणामिति स्म ह ||  २   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति