वन पर्व  अध्याय २१५

मार्कण्डेय़ उवाच

स तु सम्पूजितस्तेन सह मातृगणेन ह |  २०   क
परिवार्य महासेनं रक्षमाणः स्थितः स्थिरम् ||  २०   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति