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वन पर्व
अध्याय २१५
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मार्कण्डेय़ उवाच
सर्वासां या तु मातॄणां नारी क्रोधसमुद्भवा |  २१   क
धात्री सा पुत्रवत्स्कन्दं शूलहस्ताभ्यरक्षत ||  २१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति