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वन पर्व
अध्याय २१५
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मार्कण्डेय़ उवाच
अग्निर्भूत्वा नैगमेय़श्छागवक्त्रो वहुप्रजः |  २३   क
रमय़ामास शैलस्थं वालं क्रीडनकैरिव ||  २३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति