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वन पर्व
अध्याय २१५
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मार्कण्डेय़ उवाच
अपरे गरुडीमाहुस्त्वय़ानर्थोऽय़माहृतः |  ३   क
यैर्दृष्टा सा तदा देवी तस्या रूपेण गच्छती |  ३   ख
न तु तत्स्वाहय़ा कर्म कृतं जानाति वै जनः ||  ३   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति