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आदि पर्व
अध्याय २१६
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वैशम्पाय़न उवाच
क्षिप्तं क्षिप्तं रणे चैतत्त्वय़ा माधव शत्रुषु |  २४   क
हत्वाप्रतिहतं सङ्ख्ये पाणिमेष्यति ते पुनः ||  २४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति