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शान्ति पर्व
अध्याय ३०८
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भीष्म उवाच
प्रिय़े चैवाप्रिय़े चैव दुर्वले वलवत्यपि |  १३०   क
यस्य नास्ति समं चक्षुः किं तस्मिन्मुक्तलक्षणम् ||  १३०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति