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शान्ति पर्व
अध्याय २९६
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वसिष्ठ उवाच
पृथ्वीमिमां यद्यपि रत्नपूर्णां; दद्यान्नदेय़ं त्विदमव्रताय़ |  ३६   क
जितेन्द्रिय़ाय़ैतदसंशय़ं ते; भवेत्प्रदेय़ं परमं नरेन्द्र ||  ३६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति