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शान्ति पर्व
अध्याय २१६
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शक्र उवाच
अदृष्टं वत पश्यामि द्विषतां वशमागतम् |  १४   क
श्रिय़ा विहीनं मित्रैश्च भ्रष्टवीर्यपराक्रमम् ||  १४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति