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शान्ति पर्व
अध्याय २१६
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शक्र उवाच
त्वन्मुखाश्चैव दैतेय़ा व्यतिष्ठंस्तव शासने |  १६   क
अकृष्टपच्या पृथिवी तवैश्वर्ये वभूव ह |  १६   ख
इदं च तेऽद्य व्यसनं शोचस्याहो न शोचसि ||  १६   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति