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शान्ति पर्व
अध्याय २१६
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शक्र उवाच
यदातिष्ठः समुद्रस्य पूर्वकूले विलेलिहन् |  १७   क
ज्ञातिभ्यो विभजन्वित्तं तदासीत्ते मनः कथम् ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति