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आदि पर्व
अध्याय १०९
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मृग उवाच
अन्तकाले च संवासं यय़ा गन्तासि कान्तय़ा |  २९   क
प्रेतराजवशं प्राप्तं सर्वभूतदुरत्ययम् |  २९   ख
भक्त्या मतिमतां श्रेष्ठ सैव त्वामनुय़ास्यति ||  २९   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति