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द्रोण पर्व
अध्याय ११४
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सञ्जय़ उवाच
रुक्मपृष्ठं महच्चापं भीमस्यासीद्विशां पते |  ३४   क
आकर्षान्मण्डलीभूतं शक्रचापमिवापरम् |  ३४   ख
तस्माच्छराः प्रादुरासन्पूरय़न्त इवाम्वरम् ||  ३४   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति