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वन पर्व
अध्याय २१६
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मार्कण्डेय़ उवाच
उग्रं तच्च महावेगं देवानीकं महाप्रभम् |  ४   क
विचित्रध्वजसंनाहं नानावाहनकार्मुकम् |  ४   ख
प्रवराम्वरसंवीतं श्रिय़ा जुष्टमलङ्कृतम् ||  ४   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति