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वन पर्व
अध्याय २१६
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मार्कण्डेय़ उवाच
विजिघांसुं तदाय़ान्तं कुमारः शक्रमभ्ययात् |  ५   क
विनदन्पथि शक्रस्तु द्रुतं याति महावलः |  ५   ख
संहर्षय़न्देवसेनां जिघांसुः पावकात्मजम् ||  ५   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति