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वन पर्व
अध्याय २१६
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मार्कण्डेय़ उवाच
जिघांसूनुपसम्प्राप्तान्देवान्दृष्ट्वा स पावकिः |  ९   क
विससर्ज मुखात्क्रुद्धः प्रवृद्धाः पावकार्चिषः |  ९   ख
ता देवसैन्यान्यदहन्वेष्टमानानि भूतले ||  ९   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति