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आदि पर्व
अध्याय २१७
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वैशम्पाय़न उवाच
शरीरैः सम्प्रदीप्तैश्च देहवन्त इवाग्नय़ः |  १०   क
अदृश्यन्त वने तस्मिन्प्राणिनः प्राणसङ्क्षय़े ||  १०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति