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अनुशासन पर्व
अध्याय १३७
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अर्जुन उवाच
अर्जुनस्य वचः श्रुत्वा वित्रस्ताभून्निशाचरी |  २१   क
अथैनमन्तरिक्षस्थस्ततो वाय़ुरभाषत ||  २१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति