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आदि पर्व
अध्याय २१७
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वैशम्पाय़न उवाच
महता मेघजालेन नानारूपेण वज्रभृत् |  १८   क
आकाशं समवस्तीर्य प्रववर्ष सुरेश्वरः ||  १८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति