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आदि पर्व
अध्याय २१७
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वैशम्पाय़न उवाच
दग्धपक्षाक्षिचरणा विचेष्टन्तो महीतले |  ८   क
तत्र तत्र स्म दृश्यन्ते विनश्यन्तः शरीरिणः ||  ८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति