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शान्ति पर्व
अध्याय २१७
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वलिरु उवाच
वुद्धिलाभे हि पुरुषः सर्वं नुदति किल्विषम् |  ११   क
विपाप्मा लभते सत्त्वं सत्त्वस्थः सम्प्रसीदति ||  ११   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति