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शान्ति पर्व
अध्याय २१७
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वलिरु उवाच
ततस्तु ये निवर्तन्ते जाय़न्ते वा पुनः पुनः |  १२   क
कृपणाः परितप्यन्ते तेऽनर्थैः परिचोदिताः ||  १२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति