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शान्ति पर्व
अध्याय २१७
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वलिरु उवाच
हतं हन्ति हतो ह्येव यो नरो हन्ति कञ्चन |  १४   क
उभौ तौ न विजानीतो यश्च हन्ति हतश्च यः ||  १४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति