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शान्ति पर्व
अध्याय २१७
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वलिरु उवाच
को हि लोकस्य कुरुते विनाशप्रभवावुभौ |  १६   क
कृतं हि तत्कृतेनैव कर्ता तस्यापि चापरः ||  १६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति