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शान्ति पर्व
अध्याय ३२७
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वैशम्पाय़न उवाच
परमात्मेति यं प्राहुः साङ्ख्ययोगविदो जनाः |  २४   क
महापुरुषसञ्ज्ञां स लभते स्वेन कर्मणा ||  २४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति